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तिल गुड़ घ्या आणि गोड गोड बोला

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कल शब
तुतला रही थी जब
उंगलियाँ मेरी
वायोलिन की चार तारों पर
कर रही थीं कोशिश
चुहल करने की जब
कुछ अनामिका रागिनियों के साथ
दरवाज़े पे एक दस्तक हुई
थमी उंगलियाँ
सहमी भी
हमेशा की तरह
पासवां1 के डर से
उनकी फटकारों से
जो बनते रहे हैं अवरोध
बारहा
मेरी सोह्बते -मौसिकी2 में |

सहमा
उठा
दरवाज़े का पट खोला
सामने
नन्हा एक परीवश चेहरा 3था
गालों पे जिसके
सूरज की लाली का डेरा था
साथ उसके
उसकी हमजोलियाँ4 थीं
हाथों में जिनके कुछ
गोल-गोल मीठी गोलियाँ थी
देकर मुझे कुछ दो गोलियाँ
परिज़दा5 ने
मुस्कुराके बोला
तिल गुड़ घ्या*
आणि गोड गोड बोला
तिल गुड़ घ्या
आणि गोड गोड बोला |

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आज शब
रोने लगी एक परी
सामने मेरे
लगे उगने रू पे उसके
अगणित
मायूसी के डोरे |

कहने लगी
के तुम गए हो सब भूल
फ़िराक़6 की वो राख
और वसलत7 के अपने फूल
निकला करते थे
जिस ज़ुबां से
ग़ज़लों के गुलिश्तां
डेरा डाले अब रहते हैं वां
शोले शरारे आतिशां8 |

लगा सोचने तब मैं
क्या कटु हो गए हैं
सब बोल मेरे
तिक्ता हो गयी क्या मेरी जिह्वा
या काकशः9 हो गयी है मेरी वाणी ?

तब समझ आया
हे पिरज़दे !
तेरे नन्हे लब से निकले
पिछली शब
उन शब्दों के मानी ।
पिघल गए थे
जो हर्फ़ तेरे
उस दिन मेरी जुबां पे
नसीहत10 की दो डली थे
चले गए थे तुम जिन्हें देके ।

रुपेश कुमार


1.पड़ोसियों 2.संगीत की संगत 3.परी -सा चेहरा 4.साथी,संगी 5.परी की संतान 6.जुदाई
7.मिलन 8.अंगारे, आग 9.कौवे के समान 10.सलाह

*मराठी भाषा के इस वाक्य का अर्थ है : तिल गुड़ लें और मीठा बोलें |

 
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Posted by on जनवरी 30, 2013 in हिंदी कविताएं

 

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एक दोस्त : कोयला चोर

एक दोस्त : कोयला चोर

एक दोस्त : कोयला चोर


कोयलों के चोरों की ख़बरों से
गर्म हो रहे जब आज
शहर के सारे अखबार
दोस्त मेरा वो चंदू चौक
का आने लगा है याद |

एक चोर मेरा वो दोस्त भी था
बुझे हुए कोयले का चोर
रोज़ एक बड़ी झोली लिये
आ जाता था तड़के भोर |

चुपके- से सहम -सहम के
चायवालों की सुस्त भट्टियों से
गायब किया करता था
बुझे हुए कुछ कोयले सफ़ेद बर्फियों- से |

रोज़ सुबह मिलते थे हम
नज़रों से ही बात हुआ करती थी
सहमी उसकी आँखों में
पकड़े जाने की घबराहट बसा करती थी |

एक दफ़े पूछा था उससे
“क्या नाम है तेरा ?
रहते कहाँ हो तुम ?
क्या करते हो इनका ?”
जवाब में कहा था उसने
“बड़कु है नाम मेरा
घर है मेरा पास के
चंदू चौक पे
खल्ली -चूना बनाकर इनका
लिखता हूँ स्लेट पे “

पर एक बार दिखी थी
वाल्दा उसकी
खाना पकाते हुए
बुझे हुए उन कोयलों
का आँच लगाते हुए |

पूछा मैंने माँ से उसकी
“आप बड़कु की खल्लियों को
क्यूँ आग में जलाते हो
पकी हुई इन बर्फियों को
फिर से क्यों पकाते हो ?”

सहसा गूँजने लगा है मन में
बड़कु की माँ का वो जवाब
मौन हो गया था सुनकर जिसको
कर दिया था जिसने लाजवाब |

“बेटा ! ऐसी तकदीर कहाँ
कच्चे कोयले का आँच लगाऊं
और संगत नन्हे बेटे की
स्लेट और खल्ली से कराऊँ |”

ज़ेहन में मेरी तब से कई बातें
बारहा खटकती रहती हैं
क्या इन कोयला -चोरों के भी
माएँ चूल्हे फूंका करती हैं ?

चित्र सौजन्य :jalavarna.blogspot.in

रुपेश कुमार

 
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Posted by on सितम्बर 25, 2012 in हिंदी कविताएं

 

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प्रेम- मिलन

बेचैनी डालेगी जब तेरे
विरहन रातों में अपने डेरे |
कल और परसों की बातें जब तेरे
मन -आँगन में लेने लगेंगे फेरे ||

इससे पहले की मेरे चाँद पे
छाएंगे मायुषी के घेरे |
समय की नैया खेकर मैं
आ जाऊंगा यमुना तीरे ||

कान्हा तेरा कदम्ब सहारे
उतरेगा सूने आँगन में तेरे |
दबे पाँव जाके पीछे से
डालेगा बाँहों के घेरे ||

चहुँ दिशायें खनक उठेंगी
बजेंगे तेरे मन – मंजीरे |
झिम- झिम झंकार हवा की
खेंचेंगी हमको यमुना तीरे ||

मिलन के कोई गीत सहज तब
आएँगे लब पे धीरे धीरे |
तू कान्हा कान्हा रोवेगी
मैं राधे राधे धीरे धीरे ||

चित्र सौजन्य : प्रियंका भद्री

रुपेश कुमार

 
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Posted by on अगस्त 9, 2012 in हिंदी कविताएं

 

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अहम् कुक्कुरो अस्मि

कौवा पढ़े है काक ककहरा
मेंढक देबै साज़
गधे के रेंके पे ये देखो
दुनिया थिरकै  आज |
 
खुल्लम -खुल्ला खोल के बाजु
फाड़ के अपने काज़
किश्त -किश्त कर जिस्म को अपने
 दुनिया बेचै आज |
 
एहसान बेचती कंपनियों पर
है बड़ा  देश को नाज़
शौकों को भी बाज़ारों में
दुनिया खरीदै  आज |
 
टके शेर ईमान है बिकता
 पैसे ले होबै काज
उसूल -वुसूल सब कल की खेती
दुनिया कहे है आज |
 
भौंक -भौंककर सियार सब गेरुए
 करै है जग  पे राज
कुंठित कुक्कुर है अदना आदमी
दुनिया बोलै आज |
 

चित्र सौजन्य : http://www.dinodia.com

 

रुपेश कुमार

 
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Posted by on अगस्त 6, 2012 in हिंदी कविताएं

 

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पहली बारिश

 

 

 

 

 

 

 

 

 

खिड़की से मेरी फिर आज वही
सौंधी -सी खुशबू आई है
चौके करके गर्म चूल्हे पे
माँ ने जैसे मिटटी की लेप लगाई है |

अमिया बौछार में भींगी
सीली सारी पुरवाई है
लगता है अबके बरस की पहली बारिश आई है|

बादल का कोई नटखट हांथी
पानी की फुहार बरसाने लगा है
छोटा नंगा हर लड़कपन
झूम-झूम कर नहाने लगा है |

ठन्डे -ठन्डे गोल बताशे
अम्बर बरसाने लगे हैं
लुट -लुट कर हर बच्चे
बड़े चाव से खाने लगे हैं |

कोरे कागज़ भी
नाव बनकर अब बह जायेंगे
चंदू को वो बंकू के
घर तक  की सैर कराएँगे |

पेड़ भी बारिश में जैसे
किसी मस्ती में रहते हैं
भींग-भींग के बौछारों में
बादल को पीते रहते हैं |

नक़ल करते नंगे बच्चों की
बगल की गीली एक सड़क पे
फिसल कर  शीशम गिर पड़ा है
गिरते -गिरते बावला कीकड़
भी एक पाँव पे ही खड़ा है |

चित्र सौजन्य :http://browseideas.com/beautiful-pictures-of-rain-photography/

रुपेश कुमार

 
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Posted by on जुलाई 30, 2012 in हिंदी कविताएं

 

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बीस पैसे के सिक्के


बीस पैसे के सिक्कों को
खूब पहचाना करता था मैं
बताशों के ढेर में
उछाले जाते थे जो
दादे -दादियों की अंतिम
विदाईयों पर
होती थी जो
केले , सेवों और नारंगियों के साथ |

छू -मन्तर भी कर दिया करता था
कुछेक बीस पैसे के सिक्कों को
लाल फैली चादर से
अतिक्रमण बाबा के
मंदिर के आगे |

एक दफ़े मुझे याद है
एक भिखारी के कटोरे से
गायब किये थे
कुछ बीस पैसे के सिक्के
बड़ी बददुआ दी थी उसने
सब लग गयी हाय मगर
बेचारे सिक्कों को
ग्रास बन गए
सब अतीत के |

देखने से अब लगता है
अलुमिनियम का कोई
एक अजीब टुकड़ा है
पर मोल बढ़ गए हैं अब उनके
पाँच रुपये लेते हैं
मुँह-दिखाई के
कल देखा मैंने उन्हें
एक अजायबघर में
अतीत के कोई गीत रोते हुए |
रुपेश कुमार

 

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हर रोज़ एक नया चाँद तुम्हारे लिए

 हर रोज़   एक नया  चाँद  तुम्हारे लिए

हर रोज़ एक नया चाँद तुम्हारे लिए

 
 

चाँद क्यूँ आ जाता है
मेरे तुम्हारे बीच
बैठते हैं हम जब भी बाहम
गुफ़्तगू करने कुछ ?
जी में आता है
धकेलकर पैरों से
उछाल दूँ उसे
दूर उफ़ुक़ पर
या फिर फ़ेंक दूं उठाकर
किसी गुलेल से |

ग़लती मेरी ही है
मैंने ही लायी थी
वो तस्वीर
चाँद वाली
और एक गुब्बारा भी लाया था
चाँद वाला
बड़े खुश हुए थे तुम
बातों ही बातों में
वादा कर दिया था मैंने
वो भी लाके दूंगा
जो चमकता है आसमाँ की गोद में |

माँगा था मैंने तब रात से
बस एक दिन के लिए
चाँद को
उधार में
हंस करके उसने कहा था
वो चाँदनी हंसी
अब भी याद है मुझे
कहा था उसने कैसे चिढाते हुए
ले जा सको तो ले जाओ
यहीं तो रखा है
इस ताक़ पे यहाँ |

बड़ी कशमकश हुई थी
तब चाँद के साथ
बस उठा ही लिया था उसे
पीठ पे मैंने अपने
के फुर्र करके जा बैठा था
वो फिर उसी ताक़ पे |

बहुत कोशिश की थी मैंने
तब हर शब
उतारने की उसको
मैं ज़ीना -ज़ीना चढ़ता था
वो ताक़ -ताक़ ऊपर उठता जाता था
थककर आखिर मैं एक दिन
तडके सुबह घर लौट आया था |

बड़ा एहसान -फ़रामोश है वो
कुछ ही दिन गए होंगें
फेंककर कर के एक फँदा
बचाया था डूबने से उसे
वादा किया था उसने
कम -स -कम एक दिन
आयेगा वो तुमसे मिलने
मेरे लिए |

छोडो ! जाने भी दो !
ना आया वो तो क्या हुआ ?
मैं दूँगा तुम्हे
रंगके इस कैनवास पे
हर रोज़
एक बेदाग़ नया चाँद
तुम्हारे लिए |
रुपेश कुमार

 
 
 

चित्र: Google+ में स्वित्ज़रलैंड के Werner Getzmann(photographer, web designer, instagramer) ने इस चित्र को share किया था |

 

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