कारीगरी उन उम्दे लम्हों की
चिकनी मिटटी जिसने
तेरे पिंजर 1 पे खूब चढ़ाई है
आँखों पे आतुर आँखों की
जिसने जमघट लगवाई है
बनकर वहशत वो एक दिन
बड़े खूंखार हो जायेंगे
पहन जो चोले इतराते हो
उसे बस हाड़-माँस कर जायेंगे |
जैसे आके बेचैन वक़्त की बातों में
सर्दी डायन की गलियों से
ग्रीष्म के कदम जब गुज़रते हैं
फुर्रर करके तब उसके जैसे
प्रिय प्राण पखेरू उड़ते हैं |
पाले की मार से सर्दी में
रस पेड़ों की छालों से
बहते -बहते जम जाते हैं
और जवाँ पत्ते भी तब
जोश बुझा कर सो जाते हैं
छुप करके तब खुबसूरती
बर्फों में कहीं ठिठुरती है
खाली- खाली होता है सब
धरती ऊसर 2 गयी – सी लगती है |
पिछली गर्मी के फूलों के
ग़र गंध -रस न संजोये जाते
बंद करके शीशों में
ग़र न वो रखवाये जाते
आसार जमाल -ए-सैफ़3 के तब
हवा में पुरे ग़ुम हो जाते
कुछ भी न होता उनका याँ पे
जो उनकी याद दिलाते
ग़ुल गर्मियों के सर्दी में
भले बे-रंग हो जाते हैं
इत्र पंखुरियों के उनके
सारा आलम महकाते हैं |
1.कंकाल
2.बंजर हो जाना
3.ग्रीष्म का सौंदर्य



Deboshree
मार्च 29, 2012 at 7:58 अपराह्न
Beautiful piece. Much as I like winter, the picture this one presents of the same makes me appreciate all the sunlight I get.
godpanrupesh
मार्च 30, 2012 at 9:51 पूर्वाह्न
Thank you Deboshree