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हर रोज़ एक नया चाँद तुम्हारे लिए

03 अप्रै

 हर रोज़   एक नया  चाँद  तुम्हारे लिए

हर रोज़ एक नया चाँद तुम्हारे लिए

 
 

चाँद क्यूँ आ जाता है
मेरे तुम्हारे बीच
बैठते हैं हम जब भी बाहम
गुफ़्तगू करने कुछ ?
जी में आता है
धकेलकर पैरों से
उछाल दूँ उसे
दूर उफ़ुक़ पर
या फिर फ़ेंक दूं उठाकर
किसी गुलेल से |

ग़लती मेरी ही है
मैंने ही लायी थी
वो तस्वीर
चाँद वाली
और एक गुब्बारा भी लाया था
चाँद वाला
बड़े खुश हुए थे तुम
बातों ही बातों में
वादा कर दिया था मैंने
वो भी लाके दूंगा
जो चमकता है आसमाँ की गोद में |

माँगा था मैंने तब रात से
बस एक दिन के लिए
चाँद को
उधार में
हंस करके उसने कहा था
वो चाँदनी हंसी
अब भी याद है मुझे
कहा था उसने कैसे चिढाते हुए
ले जा सको तो ले जाओ
यहीं तो रखा है
इस ताक़ पे यहाँ |

बड़ी कशमकश हुई थी
तब चाँद के साथ
बस उठा ही लिया था उसे
पीठ पे मैंने अपने
के फुर्र करके जा बैठा था
वो फिर उसी ताक़ पे |

बहुत कोशिश की थी मैंने
तब हर शब
उतारने की उसको
मैं ज़ीना -ज़ीना चढ़ता था
वो ताक़ -ताक़ ऊपर उठता जाता था
थककर आखिर मैं एक दिन
तडके सुबह घर लौट आया था |

बड़ा एहसान -फ़रामोश है वो
कुछ ही दिन गए होंगें
फेंककर कर के एक फँदा
बचाया था डूबने से उसे
वादा किया था उसने
कम -स -कम एक दिन
आयेगा वो तुमसे मिलने
मेरे लिए |

छोडो ! जाने भी दो !
ना आया वो तो क्या हुआ ?
मैं दूँगा तुम्हे
रंगके इस कैनवास पे
हर रोज़
एक बेदाग़ नया चाँद
तुम्हारे लिए |
रुपेश कुमार

 
 
 

चित्र: Google+ में स्वित्ज़रलैंड के Werner Getzmann(photographer, web designer, instagramer) ने इस चित्र को share किया था |

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2 Responses to हर रोज़ एक नया चाँद तुम्हारे लिए

  1. ashreyamom

    मई 16, 2012 at 5:27 अपराह्न

    wow.. how do u manage to type in hindi.. nice poems.. please do chk out my poems which i had written years back..
    http://ashreyamom.wordpress.com/2006/09/

     

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