में प्रकाशित किया गया था प्रशस्ति

इरफ़ान ख़ान

इरफ़ान ख़ान हर क़मीज़ अच्छी लगती है
तुमपे
वाजिब हो
ग़र ये भी कहूँ
तुम अलग दिखते हो हर लिबास में |
स्वाँग भरना
और अदाकारी
अलहदा हैं
यक़ीन हुआ है बारहा
जब-जब देखा है तुम्हें
रुपहले पर्दे पर
हर बार एक नई ज़िन्दगी जीते हुए ।

रुपेश कुमार
रुपेश कुमार


में प्रकाशित किया गया था हिंदी कविताएं

माँ

माँ
माँ

एक अनूठी तस्वीर है तुम्हारी
आँखों के कोटर में
छुपाये रखता हूँ
ख़ुदा दिखता है तुझमें हँसते हुए
कोई जादू कर रही हो तुम
गर्म चौके पे
बर्तन के उपर बर्तन रखते हुए ।

अनोखी है ये तस्वीर
जब-जब देखता हूँ
यादों की पुरवाई चलती है
तेरी खुशबू लेकर
ओढ़कर जिसे मैने अक्सर
गर्मी की छुट्टियाँ
गुज़ारी थी
चली जाती थी तुम
घर नानी के
जब बिन मुझे लिये ।

कभी-कभी तो तस्वीर से
निकल आते हैं सारे जानवर
नाम ले जिनकेँ
न जाने कितने कौर
कितने निवाले खिलाये थे ।

कई दफ़े सुना है मैने
इस तस्वीर से कान लगाकर
गुदगुदी वाली किसी चिड़ियों के
कोई गीत गूंजते हैं
खुदाई आवाज़ के जो ये सुर हैँ
ख़ूब पहचानता हूँ मैं
दे रहा है कौन दाने
गौरैयों को
मुझे खिलाने  के लिये ।

ये तस्वीर जो मैने
अपनी आँखों मे बसाई है
पुलिंदे हैं तेरी यादों के
भूलने से भी न भूलेंगे
माँ ! मस तुम्हारे हाथों के ।

रुपेश कुमार
रुपेश कुमार
में प्रकाशित किया गया था हिंदी कविताएं

क्या है तारीफ़ अदम की ?

क्या है तारीफ़ अदम  की ?
क्या है तारीफ़ अदम की ?

तारीफ़ सुनाऊँ  क्या मैं तुमको
अपने इस लोकतंत्र की
अदम ने ही पैदा किया
अदम की ख़ातिर
ये सरकार अदम की ।

छट्ठी पे ही
अफ़ीम चाट ली
अपने -अपने मज़हब की
पहन अँगोछा केसरिया
हो गए बलम धरम की ।

मस्ती के दीवाने हैं
धूत् नशे में गाते हैं
ये रियासत हमसे है
हम ही सरकार चलाते हैं ।

इस बद -मस्ती पे अदम की
मैं बेबाक़ हो जाता हूँ
जनता की इस परिभाषा पे
बारहा अंदेश-नाक हो जाता हूँ ।

नशेबाज़ क्या ये मजनूँ ही
जनता कहलाते हैं
आगे जिनके बेकार ही हम
इल्म का बीन बजाते हैं ।

जनता की
जनता से बनी
जनता की ख़ातिर
गर तारीफ़ यही है
एक लोकतंत्र की
कोई बताये मुझको ये
क्या है तारीफ़ अदम की ?

रुपेश कुमार

में प्रकाशित किया गया था हिंदी कविताएं

*सेल्फ़िज़

सेल्फ़िज़ (Selfies)
सेल्फ़िज़ (Selfies)

तुम्हारी एक अलग दुनियाँ है
हम सब से परे
हर मरासिम से ऊपर
तुम्हारी दुनियाँ
अंकबूत1 के जाल -सी बिछी
‘वेब ‘ कि दुनियाँ ।
फँसी हो इस जाल में
या ओढ़े बैठना है तुम्हें
बैठ जाओ
ओढ़ लो ये पश्मीना तुम्हारा
पर याद रहे
जब उलझने लगेंगें
पाँव तुम्हारे
फिर तुम्हें
मेरे-तुम्हारे इस रिश्ते की
याद आएगी
हर पल ‘बाइट’ के जो
धागे बुनती हो तुम
जकड़ने लगेंगे तुम्हें ।
वो शब्द जो तुम्हें
अपनों से ज्यादा सुकूँ देते हैं
दूर दराज़ के
बेमाने पराये लफ्ज़ लगने लगेंगें ।
तुम्हारी ‘सेल्फ़िज़’ पे जो
‘लाइक ‘ का अनसोचा अनमना
ठप्पा मारते हैं
ग़ुम हो जायेंगें
गर्दिशे-अय्याम के ग़ुब्बार में2
तब तुम्हारे कांपते बूढ़े हाथ
टटोलने लगेंगें फिर इसी हाथ को
इंकार करती रही
बार-बार तुम जिनको ।

रुपेश कुमार


*सेल्फ़िज़:खुद की ऐसी तस्वीर जो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पे उपयोग करने के लिए खुद खिंची गयी हो या खिंचवाई गयी हो |

1.मकड़े
2.गुज़रे हुए वक़्त की धूल

में प्रकाशित किया गया था गीत

इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों

इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों

छायाचित्र : http://www.absolutearts.com

होता है क्या ये प्यार
मैंने सोचा न कभी
यूँही कटती थी ज़िन्दगी
जैसे ग़ुल बे-ख़ुश्बू
मिला जब मैं तुझसे
हुई हस्ती ख़ूबतर1
रब दी है सौ
यही अब है आरज़ू
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों ।

ज़माने के सनम2 सौ
एक तू मेरा ख़ुदा
नील समंदर तू
मैं तो एक दरिया
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों ।

तुझसा दिखता कौन
मेरे तू ऐ ख़ुदा !
उठे ये ज़ुल्फ़ सदाब3
गिरे रँगे-ज़र्दा4
मेरे क़रीने5 माँग
तू कहे मर जाऊं
माँगो दे दूँ जान
तुम बिन मैं दश्ते-गर्दा6
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों ।

बुनते रहे गर्म सपनें
चाहे जो भी हो मौसम
बहारे-ज़िंदगी तू
तुझसे ही सारे मौसम
फिर जाग जियेगा
जो ख़ाक़ में है दफ्न
मज़ार पे जो पड़े
शकीना7 तेरा बोसा8
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों ।

इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों
इस तरह ही हम तुम मिलते रहे सदियों ।

रुपेश कुमार

 


1.बेहतर 2.मूर्ति 3.शक्ति,ताक़त 4. पीला, बे-रंग
5.दोस्त, संगी 6.मरुस्थल की धूल 7.जिसमें ख़ुदा बसता हो 8.चुम्बन

में प्रकाशित किया गया था हिंदी कविताएं

बे-लिबास मौसिक़ी

बे-लिबास मौसिक़ी
बे-लिबास मौसिक़ी

                                                                                             छायाचित्र :www.juchuanart.com

आज पूरब-पश्चिम  उत्तर-दक्षिण चहुँ  ओर  संगीत की  लोक-प्रियता  बे-लिबास काया की मोहताज़  हो गयी है  ।  गत दिनों एक गायिका ,जिनका नाम ही उन्हें  बार -बार अच्छा गाने की गुज़ारिश करता है , एक ‘कॉन्सर्ट ‘ में  दिशाओं को ओढ़ के आयी थी। संगीत -प्रेमी उतावले हो गए थे (मतवाले गजराज की  तरह )।  मैं ,जिसे संगीत का श्वेत-श्याम चित्र ज्यादा लुभाता है , चुप न रह सका ।  जूनून में कुछ  बड़ -बड़  कर गया ।

गुनगुनाती है पछिया हवा

जब गाती एक मोहतरमा

झूमता है सारा आलम

झूमता तब है आसमाँ ।

किन्तु ना जाने “मैडम ” के

कल नाम को क्या हुआ था

कल शाम तक वो बदमाश

कटु -तोता बना हुआ था ।

साहिबाँ को हर-पल खड़ी -खोटी सुना रहा था

‘ गीत गाओ संगीत गाओ’ की रट लगा रहा था ।

गनीमत पेटी वाले “डोराफासो” बाबा से

सुबह कॉफी हाउस पे मिला था

कह सुनाया उसने

जो शिकवा और गिला था ।

मैं क्या गलत कहता हूँ बाबा

तुम्हीं ज़रा बताओ

छोड़ों प्रिये देह-नुमाईश

गायिका हो तुम गान गाओ ।

हँसकर के बाबा ने

उसे कोई राज़ बताया

जो बात कभी समझ नही आयी

उसे बख़ूबी समझाया ।

बेटा ! बन्दर की इस सभ्यता में

अब संगीत कौन सुनता है

और नए ज़माने की मौसिक़ी है

बे-लिबास घूमें

इतना तो यार बनता है ।

रुपेश कुमार

में प्रकाशित किया गया था हिंदी कविताएं

वस्ल का सवेरा

वस्ल का सवेरा
वस्ल का सवेरा

पूछती रहती हो हर रोज़
तुम मुझसे सदा
कब ऐसा होगा
कब वैसा होगा
बाद वसलत के जब
हिज्र का न कोई फेरा होगा ।

मिलते हो तुम
एक-दो पल किये
उतर जाते हैं दिन के सारे क़र्ज़
आलम ऐसा है
मुख़्तसर वस्ल का
बाद शब -ए -बारात के
वस्लत का वो कैसा सवेरा होगा ।

अपनी क़श्ती लिए
हम जायेंगे कहाँ
शहद और चाँदनी में
भीगेंगे हम कहाँ
बरसों तकती रही मैं जिसको सदा
कब सचमुच वो चाँद मेरा होगा ।

आशियाँ सपनों का
कैसा होगा अपना
क्या कलकल बहेगी नदियाँ वहाँ
कैसा होगा मेरा वो नशेमन
सब्ज़ चादर बिछी होगी दूर तक
दराज़ तक न कोई आबादी का घेरा होगा ।

तुम बताओ मुझे
कब ऐसा होगा
रंग जायेंगे जब
घर दोनों एक रंग में
और अपनों के बीच
जब न लफ्ज़ कोई तेरा-मेरा होगा ।

मैं कहता हूँ तुमसे
ऐ प्रिये ! सुनो
वक़्त-ए-हिज्रां में तुम
गिन-गिन ख्वाब चुनो
वस्ल का एक दिन अपने सवेरा होगा
सपनें सारे तेरे पूरे हो जायेंगे
मिलेगी तुम्हें पुरनूर चाँदनी
और मुस्काता हुआ ये चाँद तेरा होगा ।

रुपेश कुमार